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    Home»भारत का इतिहास»मध्यकालीन भारत»वैवाहिक रीति-रिवाज

    वैवाहिक रीति-रिवाज

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    By Kerry on 13/12/2022 मध्यकालीन भारत, राजस्थान का इतिहास
    वैवाहिक रीति-रिवाज

    वैवाहिक रीति-रिवाज | भारत में विवाह संबंधी कई रीति-रिवाज व प्रथाएँ प्रचलित है. रीति-रिवाजों से तात्पर्य उन कर्तव्यों और कार्यों से है, जिन्हें विशेष अवसरों पर परम्परा की दृष्टि से आवश्यक समझा जाता है

    वैवाहिक रीति-रिवाज

    भारत में विवाह संबंधी कई रीति-रिवाज व प्रथाएँ प्रचलित है. रीति-रिवाजों से तात्पर्य उन कर्तव्यों और कार्यों से है, जिन्हें विशेष अवसरों पर परम्परा की दृष्टि से आवश्यक समझा जाता है. यहाँ पर हम अनेक प्रकार की वैवाहिक प्रथाओं के बारें में पढेंगे

    • बरी पड़ला वर पक्ष विवाह के अवसर पर वधू के लिए शृंगारिक सामान, गहने एवं कपड़े लाता है, जिसे ‘बरी पड़ला’ कहते हैं।
    • मोड़ बांधना विवाह के दिन घर के सिर पर सेहरा एवं उस पर मोड़ बांधा जाता है।
    • टीका (तिलक) : विवाह निश्चित होने पर वे उपहार जो लड़की के पिता की ओर से लड़के के लिए भेजे जाते थे, ‘टीका’ कहलाता था। राजपूतों में वर का पिता अफीम गलाकर उपस्थित लोगों की मनुहार करता है। इसे सगाई का अमल (दस्तूर) कहा जाता है।
    • रीत विवाह निश्चित होने पर लड़के वालों की तरफ से लड़की को भेजे जाने वाले उपहार ‘रीत’ कहलाते थे। सामेला (मधुपर्क) जब वर वधू के घर पहुंचता है तो वधू के पिता द्वारा अपने संबंधियों के साथ वर पक्ष का स्वागत करना, ‘सामेला’ कहलाता है।
    • बिंदोली विवाह के एक दिन पूर्व वर व वधू की निकासी निकाल है जो बिंदोली कहलाती है।
    • सगाई वर पक्ष की ओर से वधू के लिए जो गहने, कपड़े, मिठाई आदि दी जाती है, उसे पहरावणी या चिकणी कोथली कहते हैं। सगाई के बाद वर को मुख्य रूप से गणेश चौथ पर तथा वधू को छोटी व बड़ी तीज तथा गणगौर पर उपहार भेजे जाते हैं। लग्न पत्रिका (पीली चिट्ठी) सगाई के पश्चात् पुरोहितों से विवाह की तिथि तय करवा कर कन्या पक्ष वाले उसे एक कागज में लिखकर एक नारियल के साथ वर के पिता के पास भिजवाते हैं। इसे लग्न पत्रिका अथवा पीली चिट्ठी भेजना कहते हैं।
    • इकताई वर की अंगरखी (बगलबन्दी), कुर्त्ता व चूड़ीदार पायजामा (सब गुलाबी रंग के कपड़े) बनाने के लिए दर्जी मुहूर्त से नाप लेता है। ये कपड़े निकासी के दिन पहने जाते हैं।
    • मुगधणा भोजन पकाने के लिए काम में ली गई लकड़ियाँ। हलदायत की पूजा विवाह के तीन दिन पाँच दिन, सात दिन, नौ दिन या ग्यारह दिन पूर्व लग्न पत्रिका पहुँचाने के बाद वर पक्ष एवं वधू पक्ष दोनों ही अपने-अपने घरों में गणेश पूजन कर वर और वधू को पूर्व की ओर मुख करके पाट पर बैठाकर पी पिलाते हैं। इसे पाट बैठाना या बाने बैठाना कहते हैं।
    • राति जगा वर के घर पर बरात जाने की पूर्व रात्रि तथा वधू के घर पर विवाह के पूर्व की रात्रि तथा सुहाग रात्रि को रात्रिभर जागरण कर वर-वधू की मंगल कामना के गीत गाये जाते हैं। देवी-देवताओं के गीतों के अतिरिक्त मेहन्दी, चंदर, काछवा, मीरिया, खटमल, ओडणी, कूकड़ी आदि के गीत गाये जाते हैं। कूकड़ों का गीत प्रातः होते ही राति जगा की समाप्ति पर गाया जाता है।
    • बत्तीसी नूतना : इस अवसर पर वर तथा वधू की माता अपने पीहर वालों को निमंत्रण देने व पूर्ण सहयोग की कामना प्राप्त करने जाती है। इसे बत्तीसी या भात नूतना कहा जाता है।
    • मायरा अपने लड़के के विवाह पर माता अपने पीहर वालों को न्यौता भेजती है। तब उसके पीहर वाले अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार उसे जो कुछ देते हैं, उसे मायरा या भात भरना कहा जाता है। निकासी वर अपने सम्बन्धियों व मित्रों के साथ वधू के घर की ओर प्रस्थान करता है। इसे जान चढ़ाना या निकासी कहते हैं।
    • कंवारी जान का भात बरात का स्वागत करने के बाद बरात को भोजन कराया जाता है। यह कंवारी जान का भात कहलाता है।
    • चाक-भात विवाह से एक दिन पूर्व दुल्हे-दुल्हन के मामा की ओर से वस्त्राभूषण परिवार वालों को भेंट किए जाते है वह भात कहलाता है।
    • तोरण जब वर कन्यागृह पर प्रथम बार पहुंचता है तो घर के दरवाजे पर बंधे तोरण को घोड़ी पर बैठे हुए छड़ी या तलवार द्वारा सात बार छूता है। तोरण मांगलिक चिह्न होता है।
    • छेड़ा छेड़ी विवाह के अवसर पर हथलेवा के समय दुल्हा-दुल्हन के दुपट्टे और चुनरी के छेड़े में लगाई जाने वाली गांठ।
    • पाणिग्रहण वर और वधू को मामा ले जाकर वधू व घर के हाथों में मेहन्दी रख कर हाथ जोड़े जाते हैं। इसे हथलेवा जोड़ना कहते हैं। फेरों के समय स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं :
      • “पहले फेरे बाबा री बेटी, दूजे फेरे भुआ री भतीजी
        तीजे फेरे मामा री भानजी, चौथे फेरे धी हुई रे पराई।”
    • सात फेरों के पश्चात् वैध रूप से विवाह पूर्ण समझा जाता है। सात फेरों के पश्चात् वर वधू को सिन्दूर दान करता है।
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    • कन्यावल विवाह के दिन वधू के माता-पिता, बड़े भाई बहिन आदि उपवास रखते हैं। कन्यादान के पश्चात् ही वे कन्या का मुख देखकर भोजन करते हैं। इसे कन्यावल रखना (अखनाल, कळवास्या) कहा जाता है।
    • पहरावणी रंगबारी बारात बिंदा करते समय प्रत्येक बाराती तथा वर-वधू को यथाशक्ति-धन व उपहारादि दिये जाते है, जिसे पहरावणी कहते हैं।
    • ओझण: बेटी को फेरों के बाद दिया जाने वाला दहेज।
    • जेवनवार वधू के घर पर बरात को चार जेवनवार (भोज) देने का आम रिवाज है। पहला जेवनवार पाणिग्रहण के पूर्व होता है, जिसे ‘कंवारी जान का जोमण’ कहते हैं। दूसरे दिन का भोज परणी जान का जीमण’ कहलाता है। शाम का भोजन ‘बड़ी जान का जीमण’ कहलाता है। चौथा भोज मुकलानी कहलाता है। इसमें केवल घर के ही सदस्य व घनिष्ठ मित्र जीमते हैं।
    • लडार कायस्थ जाति में विवाह के छठे दिन वधू पक्ष की ओर से वर पक्ष को दिया जाने वाला बढ़ा भोजा हीरावणी विवाह के दौरान दुल्हन को दिया गया कलेवा।
    • बरोटी विवाह के पश्चात् दुल्हन के स्वागत में दिया जाने वाला भोज जुआ जुई विवाह के दूसरे दिन प्रातः वर को कंबए कलेवे के लिए वधू के घर ‘मांडे’ में बुलाया जाता है। दोपह को ‘जुआ जुई’ खेलाया जाता है।
    • ओलन्दी वधू के साथ उसके पीहर से उसका छोटा भाई या कोई निकट सम्बन्धी आता है। वह ओलन्दा या ओलन्दी (अणवादी) कहलाती है।
    • हथबोलणो दूल्हन का प्रथम परिचया
    • रियाण: पश्चिमी राजस्थान में विवाह के दूसरे दिन अफीम द्वारा मेहमानों की मान-मनुहार करना।
    • हरक बनोला : श्रीमालियों में यदि किसी की पहली लड़की का विवाह होता है, तो वह चावल और लापसी बनाकर निकट सम्बन्धियों को खाना खिलाता है। इसे हरक बनोला कहते हैं।
    • सिंघोड़ा : श्रीमालियों में विवाह से एक दिन पहले रात को ‘सिंघोड़ा’ होता है। वधू के घर की स्त्रियाँ वर के घर जाती हैं और वर के मुँह पर दही लगाती है।
    • सामा: श्रीमालियों में दूसरे दिन प्रातः ‘सामा’ की रस्म पूरी की जाती है जिसके अनुसार वर को तैयार करके गद्दी पर बिठा दिया जाता है। वधू का पिता अपने सम्बन्धियों के साथ आकर वर के तिलक लगाता है।
    • छिक्की पुष्करणा ब्राह्मणों में कुँवारी जान के दूसरे दिन छिक्की होती है। दोपहर के बाद वधू घोड़ी पर सवार होकर वर के घर आती है। उसके साथ उसके घर की स्त्रियाँ और पुरुष सब होते हैं। वधू की दरवाजे पर सुहागण स्त्रियां आरती करती हैं तथा एक रुपया और नारियल से उसकी गोद भरती हैं।
    • मुकलावा या गौना : विवाहित अवयस्क कन्या को जब वयस्क होने पर उसे अपने ससुराल भेजा जाता है ‘मुकलावा’ कहलाता है।
    • बढ़ार विवाह के अवसर पर दुल्हन वालों की तरफ से विवाह के दूसरे दिन दिया जाने वाला सामूहिक प्रीतिभोज ।

    वैवाहिक रीति-रिवाज FAQ

    Q 1. वैध रूप से विवाह पूर्ण कब समझा जाता है?

    Ans – सात फेरों के पश्चात् वैध रूप से विवाह पूर्ण समझा जाता है।

    आर्टिकल को पूरा पढ़ने के लिए आपका बहुत धन्यवाद.. यदि आपको हमारा यह आर्टिकल पसन्द आया तो इसे अपने मित्रों, रिश्तेदारों व अन्य लोगों के साथ शेयर करना मत भूलना ताकि वे भी इस आर्टिकल से संबंधित जानकारी को आसानी से समझ सके.

    यह भी देखे :- विधवा विवाह
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